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    होली नहीं है साँवरी
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पूर्व जैसी आज की
होली नहीं है साँवरी

चैत के मंजर नहीं
महुआ नहीं सेमल नहीं
जो बिताये थे कभी जो
आज वैसे पल नहीं
मन लुभाती प्रेम की
बोली नहीं है साँवरी

साँवरी चैती नहीं
हर ओर केवल शोर है
जो तपाता देह सबकी
फागुनी यह भोर है
फाग में डूबी हुई
टोली नहीं है साँवरी

कौन सा हुड़दंग हमको
अब दिखाई दे रहा
नफ़रतों का रंग हमको
अब दिखाई दे रहा
प्रेम से आशीषती
रोली नहीं है साँवरी

- अनिरुद्ध प्रसाद विमल
१ मार्च २०२६

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