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कान में मिसरी
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बड़े अजब-गजब
लगते हैं - पिचकारी के ढँग!

टेसू के वंदनवार लगे हैं
मधुऋतु के द्वारे!
लगातार वो जीत रहे हैं
औ हम हैं हारे!!
कान में मिसरी
घोल रहे- किलकारी के ढँग!

रंगों के मेले में देखो-
सात रंग दिखते!
भौंरे खुश्बू के मिजाज पर-
कविताएँ लिखते!!
पुष्प के मन को
भाते हैं - फुलवारी के ढंग!
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- अविनाश ब्यौहार 
१ मार्च २०२६

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