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     आई होली
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पिया मोहे रँग दो आई होरी
चुनरिया रह नहीं जाये कोरी

किंशुक के दहके देखो लब
महुआ पीकर पगलाया अब
आम्र-मंजरी मटक-मटक के
करती अलि से बरजोरी

गेंदा और चमेली पाटल
प्रेम कुंज की खोले साँकल
महक रहा मकरंदित यौवन
चंपई रंग में गोरी

ताक रहे गोपिन को ग्वाले
रंग छिपा पीले कुछ काले
डूब गए सब प्रेम रंग में
बैठी मैं बन भोरी

पाटल गाल रँगो पिय मोरे
खेलो होरी श्याम छिछोरे
अब जीवन का तन-मन रँग दो
बाँध प्रीति की डोरी

- भीमराव 'जीवन'
१ मार्च २०२६

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