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     फागुन मुझे बुलाता है
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वह फागुन मुझे बुलाता है

जो फागुन बसता गाँवों में
बागों की खिली अमराई में
कलियों में फूलों में बिहँसे
सरसों की नवल तरुणाई में
मँडराती उड़ती तितलियों के
रंगों में घुला इतराता है
वह फागुन मुझे बुलाता है

मेरा फागुन घर-आँगन में
चूनर में रंगा नाचे गाए
वह इंद्रधनुष सा घटे-बढ़े
मेहों सा झूम बरस जाए
बिन मौसम औ' बिन ऋतुओं के
जन-जीवन जो हर्षाता है
वह फागुन मुझे बुलाता है

एक फागुन है मन में मेरे
जो कण-कण में रस रंग भरे
अभिनंदन को हुलसित वसुधा
निज हाथों से शृंगार करे
लेकर गुलाल जो होली में
मेरे घर चलकर आता है
वह फागुन मुझे बुलाता है

- जिज्ञासा सिंह
१ मार्च २०२६

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