अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

                        .
             
फागुन उतरा है आँखों में
  .
धरती की धानी चूनर पर
बूटे पीले लाल
फूल दहके पलाश के
अंजुरी भरे गुलाल

बहक रहा महुआ मस्ती में
अमराई बौराये
झूम रहा रंग में गुलमोहर
नीम खड़ी मुस्काये
हिला रही है हवा दूर से
बासंती रुमाल

लौट रहे दिन उल्लासो के
खनके ढोल-मंजीरे
ढही दीवारें राग द्वेष की
टूटी सभी लकीरें
गूँज उठी फगुवा के
गीतों से सूनी चौपाल

खिली धूप संग पुरवा करती
रह- रह हँसी- ठिठोली
माड़ गयी पीले पत्तों की
द्वार- द्वार रंगोली
सजे हुए स्वागत में पपड़ी
गुझियों वाले थाल

बुझा-बुझा मौसम था मन का
दिन थे रीते रीते
सर- सर उड़े चुनरिया
जब से पड़े प्रेम के छींटे
आँखों से झर रही खुमारी
हुए गुलाबी गाल
फूल दहके पलाश के

- मधु शुक्ला
१ मार्च २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter