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      फाग खेलने के दिन
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ऋतु वसंत ने पर फैलाए
फाग खेलने के दिन आए

सरसों ने चूनर लहराई
पुष्पों पर मादकता छाई
उपवन का तन-मन हर्षाया
मंद पवन ने सोहर गाया
तरुओं पर खेलें नव पल्लव
कोकिल लोरी गीत सुनाए
फाग खेलने के दिन आए


बिछे धरा पर धनक की चादर
रंग गले मिल रहे परस्पर
लगे गुलाल अब ऐसा तन पर
भेदभाव कुछ रहे न भीतर
ठंडाई गुझिया के जैसा
हर रिश्ता-नाता बन जाए
फाग खेलने के दिन आए

- परमजीत कौर 'रीत'  
१ मार्च २०२६

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