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  फागुन के रंग
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पछुआ आई पाँव पखारे
द्वारे उतरा फाग
टेसू सेमल घोल रहे हैं
राग-रंग अनुराग

रजनी चन्दा थाल सजाए
रोली-सा दिनमान
माटी के कण-कण में जागे
रंगों के अभियान
धरा पहनकर रंग फगुनिया
रचती राग-विहाग
द्वारे उतरा फाग

नैहर आँगन लौटी बिटिया
हँसी -ठिठोली बात
सखियाँ दौड़े गले लगाएँ
रंग भरे सब गात
अँखियों में संचित बरसों का
पिघला सारा राग
द्वारे उतरा फाग

भाभी खेले रंग-गुलाल
अँगना भरे उमंग
चूड़ी, बिंदी, चुटकी-चुनरी
ननदी हँसती संग
नोक-झोंक में झर-झर बरसे
नेहिल मनस पराग
… द्वारे उतरा फाग

फागुन की पगड़ी में सजते
इन्द्रधनुष के रंग
सरसों पीली लगे सलोनी
मधुकर तितली संग
ढोलक थाप मंजीरा बाजे
गूँजे मृदु सुर-राग
द्वारे उतरा फाग

फागुन केवल रंग नहीं है
मन का है विस्तार
भूल-भेद सब गाँव-गली में
मना रहे त्यौहार
एक हुआ जन-मन का आँगन
महक उठा है बाग
द्वारे उतरा फाग
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- पारुल तोमर
१ मार्च २०२६

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