अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

                        .
                
  मारुत से कह दो
  .
ऋतु वसंत पुष्प पुष्प भँवरों के पहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे

कह दो कि
चिड़ियों के कलरव को सुन ले
कह दो कि
मन के कुछ भँवरों से मिल ले
कह दो कि रंग अभी बिखरा नहीं हैं
होली का पर्व अभी निखरा नहीं है
रुको अभी डगर-डगर सुख-समंद लहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे

कह दो कि
सरसों की पंखुरियाँ गिन ले
कह दो कि
तितली से माँग एक दिन ले
देखो तो अमलतास सजा तक नहीं
देखो ढप-मंजीरा बजा तक नहीं
रुको अभी गलियों गुलाल उड़ें गहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे

- पूर्णिमा वर्मन 
१ मार्च २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter