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    दिखे रंग ही रंग
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बरसे अम्बर भीगे धरती
दिखे रंग ही रंग
मन बौराया उड़ा जा रहा
जैसे उड़े पतंग

फूली सरसों खिल गए टेसू
आमों मे आ गए बौर
कोयल कुहुकी बुलबुल चहकी
आई सुखद सुहानी भोर
बगिया महकी तितली बहकीं
मनुआ हुआ मलंग

ढोल बजे मजीरा झनके
थिरक उठा जन जन
फाग चले जब सात सुरों पर
झूम उठा तन मन
बरसाने में धूम मची है
होली का हुड़दंग

भंग छनी घोली ठण्डाई
गुझिया भरी मिठास
आए गले मिले हमजोली
छाया है उल्लास
याद आ गई होली ब्रज की
ऐसे बजा मृदंग

- सुधा शुक्ला  
१ मार्च २०२६

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