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  फाग सुहाना
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झूम रहा है रंग गगन में
फाग सुहाना किसे बुलाएँ

गालों पर ही
ठहर गई है शर्म हया की सुंदर लाली
चंचल सा मन बाँध न पाए
हँसी ठिठोली द्वार द्वार पर रंग प्रेम के,
भीगे अपने कौन बचाए

टेसू दहके, धूप निखरती
रंग उछालें हृदय सजाएँ

ढोलक पर ही
थिरक रही है ताल मदिर सी
कदम मिलाकर रास रचाएँ
भीतर बाहर भरी उमंगें है अधीर भी 
मन की धड़कन किसे बताएँ

रूठे मन भी गले मिलें अब
प्रेम तराना सब मिल गाएँ

भीगी चुनरी
हँसती अँखियाँ चमके कजरारी
साँसों में भी गंध गुलाली
फागुन बोए रंग सुनहरे प्रीति पुकारे
रंग समर्पित जीवन डाली

आज रहे न कोई पराया 
रंग बहाना दिल मिल जाएँ
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- सुशील शर्मा
१ मार्च २०२६

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