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    अग-जग भूली प्रिय की हो ली
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प्रीति-रंग की हाला घोली
सूरत भोली नीयत डोली

पकड़ कलाई
जोरा-जोरी
भीज गई
गोकुल की छोरी
मन बौराया रोक न पाया
रसिया ने रँग डाली चोली

खुली खिड़कियाँ
बंद किवारे
चहके विहग
प्रीति के द्वारे
बंसी बजी साँवरे की जब
मोहक धुन पर बहकी भोली

नटखट श्याम
न छोड़े पल को
गोरी भाँप न पाई
छल को
सौंप दिया तन-मनजीवन को
अग-जग भूली प्रिय की हो ली

छुए अँगार अधर से
ज्यों ही
शिथिल हो गए बंधन
त्यों ही
नींद खुली तो टूटा सपना
होली क्या जो हो न ठिठोली


- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल  
१ मार्च २०२६

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