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ज्योति पर्व
संकलन

 

प्राण दीप

रात भर जलता रहा
यह दीप प्राणों का अकेला!

वेग लेकर नाश का आया पवन था,
शक्ति के उन्माद में गरजा गगन था,
दीप, पर, अविराम जलने में मगन था,
आ नही जब तक गई
संसार में नवस्वर्ण-बेला।

रात भर जलता रहा
यह दीप प्राणों का अकेला!

रात भर हँस-हँस सतत जलता रहा है
आँधियों के बीच भी पलता रहा है,
आतातायी का अहम दलता रहा है,
मूक हत भयभीत मानव
को दिया जगमग उजेला

रात भर जलता रहा
यह दीप प्राणों का अकेला।

- महेंद्र भटनागर

  

मेरे दीपक

मन माटी का दीपक बना
तन श्वेत रुई की बाती
प्यार स्नेह की लौ सुनहली
जग आलोकित कर जाती

हो नव प्रकाश पुंज उदय
जन जन के विकल हृदय में
मिट जाए हर तिमिर मनुज का
मेरे दीपक की स्वर्णिम लौ में

नव चिराग नव ज्योति फैले
बाँटे हम उजियारा
ज्योति पर्व का संदेश फैले
तम मुक्त हो जग सारा

बोध सभी को सत्ता का हो
कण-कण में भगवान की
दीपक की लौ दूर हटाए
हर चादर अज्ञान की

सत्य समर्थन की क्षमता का
सब में हो विकास नया
दीपक मेरे फैला दो जग में
चिरंजीवी प्रकाश नया।

- राज किशोर प्रसाद

 

 

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