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ज्योति पर्व
संकलन

 

जगमग जगमग

हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,
नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,
कैसी उजियाली है पग-पग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,
तुलसी के नन्हें थाले में,
यह कौन रहा है दृग को ठग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,
प्यारी प्यारी सी लहरों में,
तैरते दीप कैसे भग-भग!
जगमग जगमग जगमग जगमग!

राजा के घर, कंगले के घर,
हैं वही दीप सुंदर सुंदर!
दीवाली की श्री है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!

-सोहनलाल द्विवेदी

  

 तूफ़ान में दीप

जल रहा तूफ़ान में भी,
दीप जो उसको नमन है।

दीपको की पंक्तियाँ
सामान्य-निशि में जगमगाती।
प्रज्वलित होकर गहन तम
को सरलता से मिटाती।।

वह प्रदीप प्रकाश दे जो,
जब प्रबल झंझा पवन है।
जल रहा तूफ़ान में भी,
दीप जो उसको नमन हैं।।

चल रहे जलयान अगणित,
शांत सागर में निरंतर।
कूल पा जाते सहज ही,
वक्ष जल का चीर सत्वर।।

तरणि वह ही धन्य जो,
करती भँवर को भी सहन है।
जल रहा तूफ़ान में भी,
दीप जो उसको नमन है।

विकच जल जों पर मधुपगण
झूम गुन-गुन गीत गाते
लख ललित लावण्य उनका,
प्यार अंतर का लुटाते।

अलि वही जो यामिनी में
भी न तजता कमल वन है,
जल रहा तूफ़ान में भी
दीप जो उसको नमन है।

-विनोद चंद्र पांडेय


स्रोत : अमर सुभाष
रामा प्रकाशन - लखनऊ

 

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