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ज्योति पर्व
संकलन

 

दीप जलाना छोड़ न देना


दीप जलाना छोड़ न देना

कालरात्रि के महापर्व पर
अँधकार के दीप जल रहे
भग्न हृदय के दु:खित नयन में
आँसू बनकर स्वप्न ढल रहे
मानवता के शांति दूत तुम
प्रीति निभाना छोड़ न देना
दीप जलाना छोड़ न देना

आशाएँ सब धूल हो रही
मानवता निर्मूल हो रही
महाकारुणिक की पावनता
महाअस्म के शूल हो रही
धर्मदूत तुम प्रहरी बनकर
रीति निभाना छोड़ न देना
दीप जलाना छोड़ न देना

पाषाणों में भी जीवन हैं
उनकी आहें एक अगन हैं
धम्मचक्र के अवरोधी का
अंत मात्र ही एक कफ़न है
फिर से गूँज उठे स्वर बुद्धम्
नीति निभाना छोड़ न देना
दीप जलाना छोड़ न देना

धर्मेंद्र कुशवाहा

  

 दीपावली

दिशा-दिशा में दीपों की
आलोक-ध्वजा फहराओ
देह-प्रहित शुभ शुक्र! आज तुम
घर-घर में उग आओ
व्योम-भाल पर अंकित कर दो
ज्योति-हर्षिणी क्रीड़ा
सप्तवर्ण सौंदर्य!
प्रभामंडल में प्राण जगाओ!

जागो! जागो! किरणों के
ईशान! क्षितिज-बाहों में
जागो द्योनायक! पर्जन्यों की
अरश्मि राहों में
जागो स्वप्नगर्भ तमसा के
उर्ध्व शिखर अवदाती
श्री के संवत्सर जागो
द्युति की चक्रित चाहों में।

तिमिर-पंथ जीवन की
जल-जल उठे वर्तिका काली
पके समूची सृष्टि विभा से,
अमा घनी भौंराली
सुषमा के अध्वर्य,
उदित शोभा के मंत्रजयी ओ!
भर दो ऊर्जा से प्रदीप्ति की
भुवन-मंडिनी थाली।

गोरज-चिह्नित अंतरिक्ष के
ज्योति-कलश उमड़ाओ
स्वर्णपर्ण नभ से फिर मिट्टी
के दीपों में आओ
आभा के अधिदेव! मिटा दो
धरा-गगन की रेखा
रश्मित निखिल यज्ञफल को फिर
जन-जन सुलभ बनाओ

दिशा-दिशा में इंद्रक्रांति के
कुमुद-पात्र बिखराओ
सप्तसिंधु-पोषित धरणी की
अंजलि भरते जाओ
सुरजन्मी आलोक! चतुर्दिक
प्रतिकल्पी तम छाया
श्री के संवत्सर! ऋतुओं की
जड़ता पर छा जाओ!

- रामेश्वर शुक्ल आंचल

 

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