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ज्योति पर्व
संकलन

 

आओ मिल कर दीप जलाएँ


आओ मिल कर दीप जलाएँ
जगती के सूने सीने में
नई उमंग जगाएँ

मंदिर में दीपक बाला हो, अंजुरी में महकी माला हो
धूप सुगंधित हर आला हो, गोधूली की मंगल वेला
दीपावली सजाएँ

थाली भर हों खील बताशे, अतिशबाजी खेल तमाशे
गीत गूज़री ढोल औ' ताशे, आम अशोक बाँध डोरी में
बंदनवार बनाएँ

दीवारों पर जगर मगर हो, ज्योतित जन तन मन अंतर हो
उत्सव-उत्सव घर बाहर हो, नव संवत की सुखद सुमंगल
शुभकामना मनाएँ

- पूर्णिमा वर्मन

  

उसकी दीवाली

बुझे हुए दीप के
उठते हुए धुएँ में,
काली ऐंठी हुई बत्ती को
साक्षी मान उसने
दीवाली मनाई।

जल चुकी स्याह फुलझड़ियों को
तीली से पकड़कर नचाया
सीले अनारों में
आग लगाने का व्यर्थ प्रयत्न किया
चरखियाँ बिना नाचे ही
स्थिर पड़ी रही,
मोमबत्तियाँ टिमटिमाकर
पिघलती रही।

चारो ओर छाए घने अँधेरे में,
अंदर को प्रकाशित करने की कोशिश
नाकामयाब रही,
आँख मूँदे अंधे होकर
उसने सुनी, केवल सुनी
वही तेज़ आवाज़ें

दूर - किसी ने
सभी पटाखे एक साथ रख कर
माचिस लगा दी थी।

- स्नेहमयी चौधरी

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