अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


ज्योति पर्व
संकलन

दीपों की माला

 

दीपों की माला जले
खुशियों के फूल खिले
छुप-छुप कर तारे कहें
रात अँधेरी भी हँसे
दीपों की माला जले

बंदन घर द्वार बँधे
मंगल-घट कलश सजे
जगमग यह रात करे
झिलमिल तारों के तले
आज घड़ी आई, सुखद
जीवन के स्वप्न पले
दीपों की माला जले।

धन के अंबार जुटे
नूपुर झंकार उठे
झूमे मन मस्त मगन
बहता मदहोश पवन
अंबर और धरती पर
हीरों के रत्न जड़े
दीपों की माला जले।

-पुष्पा भार्गव

 

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।