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परदेस की नगरी

ये परदेस की नगरी है
ये परदेस की महानगरी है
आप आए हैं आपका स्वागत है
ये नगरी किसी को बुलाती नहीं है
आने के लिए टोकती नहीं है
लेकिन किसी को भी ये नगरी
वो नहीं रहने देती
बड़ी निर्मम है ये नगरी
ये काटती है पहले जड़ों से आपको
छीन लेती है गांव घर
माँ बाप भाई बहन
रिश्ते नाते दया अपनापन
नहीं रहने देती ये नगरी
आपको इंसान
बना देती है मशीन
ये नगरी चलती नहीं दौड़ती है
ख़बरदार सुस्त रफ़्तार वालों
चलते हैं जो धीमे
उन्हें छोड़ आगे बढ़ जाती है
और वे हो जाते हैं अतीत के खंडहर
नगरी वालों मुबारक तुम्हें तुम्हारी नगरी
मुझको मेरा देश मेरे लोग खींचते हैं
पर लौटना इस नगर के गद्दीदार चंगुल से
छूटना क्या इतना आसान है, क्या इतना सहज है?

— कैलाश भटनागर

पूछ रही पता घर का

खड़ी चौराहे पर पूछ रही पता घर का
वह नारी
दिखाई दी उसे एक सड़क
बोली यहाँ पिता का वास
दिखी दूसरी मंज़िल, नहीं, यह पति का निवास है
तीसरा द्वार जो बंद है– वह बेटे का है
पूछ रही, "बोलो कहाँ मेरा घर है?"
कुछ दिनों की हर जगह
कुछ नहीं स्थायी उसका है
बचपन में पिता, जवानी में पति
बुढ़ापे में बेटा
करे शोषित नारी को
ढँग अलग रूप अलग
शोषित होती नारी ही है
कमज़ोर ये समाज संपूर्ण बुद्धि की दुनिया
मरेगी हर बार नारी ही

—कैलाश भटनागर

 

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