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          फिर कोदंड उठाओ

 
बुला रही है प्यासी धरती
श्याम जलद बन छाओ
फिर से आओ राम धरा पर
आओ-आओ-आओ

जहाँ रोशनी को आना था
अंधकार छाया है
रामराज्य का स्वप्न दिखा था
असुर राज आया है

दुष्टों की दण्डित करने को
फिर कोदण्ड उठाओ

यहाँ अपहरण होते हैं अब
नित-नित सीताओं के
और पृष्ठ फाड़े जाते हैं
वन्दित गीताओं के

क्षरण हुआ नैतिक मूल्यों का
फिर से पाठ पढ़ाओ

तप्त धरा उद्विग्न पवन है
सागर खौल रहा है
अनाचार बढ़ कर अपने
पँखों को तोल रहा है

कांप रही लौ मानवता की
फिर से ज्योति बढ़ाओ

ऐसी आई रात कि जिसका
दिखता नहीं सवेरा
कालनेमियों की जमात ने
बना लिया है डेरा

भ्रमजालों के तार काट कर
स्वर्ण रश्मि फैलाओ

- मधु प्रधान
१ अक्टूबर २०२५

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