अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

     

           धुंध में लिपटी रातें

ठंडी सुबहे, ठंडी शामें
रहें धुंध में
लिपटी रातें

ऊषा किरणों की है चाहत
दोपहरी ही देती राहत
सिगड़ी पर हैं तपते रहते
कितने किस्से
कितनी बातें

दृश्य कभी कुछ और कभी कुछ
धुँधला देती धुंध सभी कुछ
जैसे निगलें एक-एक करके
दृश्यों की वे
उजली पातें

बित्ता-बित्ता है बढ़ जाती
प्रीत-प्रेम हाथों गढ़ जाती
ऊनी लच्छी में हैं उलझी
नर्म-गर्म सी
कितनी यादें

- दिव्या राजेश्वरी
१ दिसंबर २०२१
     

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter