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           कुहरे में ठाँव

जाड़ा पसार रहा धरती पर पाँव
पीपल के पत्तों से
काँप रहे गाँव

रातें खड़ीं लिये कर में कमान
छोड़ रही शीत लहर चुपके से बाण
घुटनों से जकड़न खेल रही खेल
पाला निकाल रहा फसलों का तेल
लगने को आतुर है
जीवन का दाँव

जाड़े में सूरज का बदला स्वरूप
सेंक रहा अपनी ही किरणों की धूप
ठिठुरी -सी नदी लगे ठिठुरे पहाड़
सूरज को देख मारे जाड़ा दहाड़
ढूँढ रहा छिपने को
कुहरे में ठाँव

छेड़ रही पछुआ धरती पर तान
दाँत सभी नाच रहे बौराये प्राण
आँखों में झाँक रहा हौले से कौन
टूट रहा जाड़े में संयम का मौन
सजनी-सी धूप लगे
सौतन-सी छाँव

जाड़ा दुशासन-सा खींच रहा चीर
छलका है कुटियों की आँखों में नीर
धरती की छाती पर कौन दले मूँग
कलरव को लगता है साँप गया सूँघ
बोले मुँडेर पर
कागा न काँव

- मनोज जैन मधुर
१ दिसंबर २०२१
     

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