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       तीन कुंडलिया

 

१
वीरान गुलशन
सारे गुल बेचैन हैं, गुलशन है वीरान
कलिकाओं के जिस्म पर, नीले देख निशान
नीले देख निशान, मूक है कुद़रत सारी
हतप्रभ हैं कुछ लोग, मनुजता किसने मारी
संग प्रकृति के आज, रो रहे चंदा तारे
सहमी है हर शाख, मौन हैं गुल अब सारे

२
नर्तकी
अनथक पड़ती थाप पर, नूपुर की झंकार
बँधे हुये है पाँव में, सजे देह बाजार
सजे देह बाजार, नाम बदनाम गली है
नित्य सिसकती हाय, कली की देह गली है
बनते जो हमदर्द, 'अना' वो नियमित ग्राहक
रंजन हित लाचार, नर्तकी नाचे अनथक

३
प्रेम
डूबा जब दिल प्रेम में, घट डूबा मँझधार
गई प्राण से सोंहणीं, अमर हो गया प्यार
अमर हो गया प्यार, जिंदगी उसने खोई
देखी उसकी प्रीति, मौत भी खुद पर रोई
'अना' जानता कौन, किसी का क्या मंसूबा
ली अपनों ने जान, धार में घट फिर डूबा

- अनामिका सिंह
१ फरवरी २०२६

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