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       तीन कुंडलिया

 

१
अतीत
भूले जो इतिहास को, गिरा रहे वह भीत
वर्तमान की नींव में, गौरवपूर्ण अतीत
गौरवपूर्ण अतीत, लिए सन्मार्गी वादा
सह कर भी आघात, रखी युग ने मर्यादा
विद्यमान का लक्ष्य, अनागत अंबर छू ले
चले संतुलन साध, कर्म मत अपने भूले

२
प्यास
पनघट पर कबसे खड़ी, नहीं मिटी है प्यास
थकी पथिक हूँ राह की, एक बूँद की आस
एक बूँद की आस, हृदय घट अब तक खाली
जीवन सूखा बाग, नहीं है कोई माली
मैं अज्ञानी मूढ़, तृषा का लगता जमघट
हस्ताक्षर दो ईश, सिक्त हो उर का पनघट

३
जीवन चक्र
जाना कब संसार से, कहाँ लगा अनुमान
जन्म मरण के चक्र में, पल में ही अवसान
पल में ही अवसान, श्वास ने तोड़े बंधन
व्यथित हुआ परिवार, मौन का उर में क्रंदन
विधि का यही विधान, अटल सच सबने माना
भरे रिक्तता कौन, जगत में किसने जाना

- अनिता सुधीर आख्या
१ फरवरी २०२६

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