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       तीन कुंडलिया

 

१
नारी
नारी, नारी का नहीं, देती आयी साथ
शायद उसका इसलिए, रिक्त रहा है हाथ
रिक्त रहा है हाथ, घिरे संकट के बादल
कहकर रीति-रिवाज, सदा होता आया छल
सच होगा संकल्प, नहीं होगी बेचारी
हर नारी का साथ, अगर दे दूजी नारी

२
नारे
नारे, भाषण, चुटकुले, जुमले, भृष्ट-बयान
राजनीति की किस तरह, बदल गयी पहचान
बदल गयी पहचान, तंत्र लाचार खड़ा है
ज्यों धुँधली तस्वीर, स्वर्ण का फ्रेम जड़ा है
जन-सेवक हो गये, चोर, डाकू, हत्यारे
जनता है बेहाल, मिल रही थोथे नारे

३
अच्छे दिन
धूप ओढ़कर दिन कटे, शीत बिछाकर रात
अच्छे दिन देकर गये, इतनी ही सौगात
इतनी ही सौगात, नहीं दिखता परिवर्तन
सिर्फ़ गरजते मेघ, रहा सूखा यह जीवन
पड़े हुए हैं स्वप्न, पेट में पैर मोड़कर
खोज रहे हैं छाँव, खड़े हैं धूप ओढ़कर

- गरिमा सक्सेना
१ फरवरी २०२६

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