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       तीन कुंडलिया

 

१
हिन्दी
मन हर लेती माधुरी, रस का पारावार
विविध विधाओं से सजा, हिन्दी का संसार
हिन्दी का संसार, सरस अति, सबसे प्यारा
अनगिन सुन्दर छन्द, छन्द कुण्डलिया न्यारा
कपट, क्लेश से रिक्त, रखे मर्यादा भरकर
स्नेह, प्रेम से सिक्त, सदा लेता है मन हर

२
प्रेम-रोग
यों तो है शुभकामना, रहें सदा नीरोग
प्रेम परस्पर प्रीति का, लगे सभी को रोग
लगे सभी को रोग, जोर से दिल भी धड़के
शुभ जो जिसके हेतु, नयन भी उसका फड़के
मानो मेरी बात, मित्र ! यदि सत्य कहूँ तो
बुरे घात-प्रतिघात, विदित है सबको यूँ तो२

३
रजनी
रजनी कहती चन्द्र से, सुनो हमारी बात
उजला तुमसे हो गया, मेरा श्यामल गात
मेरा श्यामल गात, हृदय शीतल हो जाता
तम की बात बिसार, मुदित हो गीत सुनाता
गूँज रही झंकार, पाँव में पायल बजनी
तारों से शृंगार, चली, कर सुन्दर रजनी

- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
१ फरवरी २०२६

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