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       अक्षर और सनातनी

 

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माघ महीना आ गया, ऋतु ने बदले रंग
लोहड़ी माघी पर्व सब, बैठ मनाएँ संग
बैठ मनाएँ संग, खाएँ मक्के की रोटी
घर-घर जले अलाव, खेत संपति है लौटी
कुहरा हुआ निराश, ठंड से डरे कोई ना
खिले-खिले दिनमान, आ गया माघ महीना

- डॉ. मधु संधु
१ फरवरी २०२६

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