अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       तीन कुंडलिया

 

१

राजा छंदो का लगे, पिंगल का उपजात
आज करें मिलकर सभी, कुण्डलिया पर बात
कुण्डलिया पर बात, और यह दिवस मनाएँ
अनुशासन के साथ, छंद-से गुण अपनाएँ
'रीत' कहे हर ओर, बज रहा छांदस बाजा
दोहे का पा मुकुट, चले कुण्डलिया राजा

२

मन में अच्छी भावना, संयम रखता साथ
सोना बन जाता सभी, जिसे लगाता हाथ
जिसे लगाता हाथ, धरा-उपवन महकाता
अनुशासन के साथ, सफलता फल वह पाता
कहती ‘रीत’ यथार्थ, वही बढ़ता जीवन में
कर्म करे जो श्रेष्ठ भावना रखकर मन में

३

कहना था जो कह लिया, अब कुछ बचा न शेष
अब कब रही शिकायतें, न मनुहार ही लेश
न मनुहार ही लेश, पराया अपना कैसा
सीख रहे व्यवहार, आज जैसे को तैसा
पर क्या सच में 'रीत', सरल है ऐसे रहना
सब कुछ सहना और, पलटकर कुछ मत कहना

- परमजीत कौर 'रीत'
१ फरवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter