अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       माँ- तीन भाव भंगिमाएँ

 

माता सा होता नहीं, दूजा कोई साथ
सुनो ईश ने ही चुना, सबके सर यह हाथ
सबके सर यह हाथ, कभी विपदा जो आये
वहाँ ढाल बन मात, स्वयं उससे लड़ जाये
कहते वेद पुराण, यह ऋण न चुकने पाता
प्रभु का है आशीष, जगत में संग हो माता

कोशिश करके देख लो, कर लो जतन हज़ार
चुका सके कोई नही, माता का उपकार
माता का उपकार, है सौगात यह ऐसी
सब सौगातें साथ, न कोई माता जैसी
कहते यह कविराय, स्पर्श में ऐसी जुंबिश
बिसरोगे हर दर्द, देख लो करके कोशिश

जब तक यह सौगात है, रह लो जी भर साथ
ना जाने कब रूठकर, ईश हटा लें हाथ
ईश हटा ले हाथ, न सौ सौ आँसू रोना
यह अवसर उपहार, इसे हरगिज ना खोना
कहते ज्ञानी संत, सभी से पावन यह तप
पाओगे तुम स्वर्ग, करो सेवा माँ की जब

- सरस दरबारी
१ फरवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter