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       माघ मास की धूप

 

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अमृत सी लगने लगी, माघ मास की धूप
दिन ढलने तक बैठकर, बिगड़ा सबका रूप
बिगड़ा सबका रूप, जमी है गप्प-पहेली
चाय चुस्कियाँ संग, शाम भी हुई नशीली
तापें रात अलाव, रोट भी गरम परोसी
गुड़-घी राब सुवाद, लगे मनको अमृत-सी

- स्मृति गुप्ता
१ फरवरी २०२६

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