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       दो कुंडलिया

 

१
अपना देश
चमक रहा है विश्व में, बनकर यह दिनमान
सचमुच प्यारा है सखे, अपना देश महान
अपना देश महान, न इसकी कोई सानी
इसी धरा पर बहता गंग- यमुन का पानी
यही धरा का स्वर्ग, कमल बन गमक रहा है
ध्रुवतारा यह अमर ज्योति में चमक रहा है

२
बीमारी
बीमारी घर में घुसी, रिश्ते हैं बीमार
कमरे-कमरे बँट गया, अब सारा परिवार
अब सारा परिवार, नहीं बैठे बतियाए
मोबाइल में कैद, दूसरों से खिखियाए
सूखा घर में प्यार, हरी बाहर की यारी
बेटे बहुएँ सास, यही ससुरी बीमारी

- उदय शंकर सिंह 'उदय'
१ फरवरी २०२६

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