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       तीन कुंडलिया

 

१
बादल
बादल वारि पयोधि से भर लाया हरषाय
हरित धरा फिर होगयी, संगत से इठलाय
संगत से इठलाय, विटप अति मोद मनाते
हर्षित होते झूम, खुशी से वे इतराते
कह उपमा समझाय, देखि मन होता पागल
बल खाते हरसाय, चले आते हैं बादल

२
अर्पण
अर्पण करता देश को, जीवन अपना लाल
उन्नत होता ही रहे, भारत का नित भाल
भारत का नित भाल, सदा परचम लहराए
दुश्मन काँपे देख, सदा ही वो घबराए
कहे सहर इस भाँति, सभी का देश हो दर्पण
अगर जरूरत पड़े, देश के हित में अर्पण

३
कविता
कविता ऐसी चाहिए, सुख पाए मन आप
शांति मिले पढ़कर उसे, मिटे हृदय के ताप
मिटे हृदय के ताप, मन हरिद्वार हो जाए
पुलकित होवे गात, नहीं चिंता भय खाए
कहे सहर सकुचाय, नहीं बनती है सविता
मातु कृपा हो साथ, सदा हो ऐसी कविता

- उपमा आर्य
१ फरवरी २०२६

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