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                 माटी का घट
 
देर सवेर सभी ने मानी
दुनिया है बस आनी-जानी

माटी का घट, उसमें पानी
बाहर पानी, भीतर पानी
कबीरा कहता रहा जगत से
टूट गया घट यों आसानी
अन्तर-घट को देख रे प्रानी
मूरख मत बन रे अज्ञानी

मृग कस्तूरी ढूँढे वन में
हमने मंदिर-मस्जिद जानी
बादल छाते नील गगन में
सूरज छुपता यही कहानी
कब से भटक रहा अभिमानी
तृष्णा करती है मनमानी

तन के पंचतत्व पिजरे से
पंछी उड़ जाना है इक दिन
जीवन की आपाधापी में
काट रहे हम पल-छिन गिन-गिन
जोड़-तोड़ में लगे हुए हम
हमने नहीं किसी की मानी

- सुरेन्द्र कुमार शर्मा
१ अक्टूबर २०२४
           

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