अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        माघ ने दस्तक दी

 
माघ ने सुबह सबेरे
दस्तक दी
ठिठुरती देह को गुनगुनी
धूप ने ताजगी दी

आसमान में धुंध कोहरा छाया
गुलाब का फूल खिल कर इतराया
नदी के तट पर मेले लग रहे हैं
भीड़ के रेले दिख रहे हैं
गहरे पानी में जनता डुबकी लगा रही है
नदियाँ अब अपने भाग्य पर इठला रही है
तिल गुड़ खाने का
मौसम आया

मकर संक्रांति का पर्व आया
सूर्य भी उत्तरायण हो गया
किरणों में अब तेज आ गया
पौष मास ने शुभता में रोक लगाई थी
माघ ने आकर ढोल और शहनाई बजाई थी
कहीं कहीं बरसता मावठा काश्तकार को लुभा रहा है
अच्छी फसल देख कर मन
हर्षा रहा है

- संजय सुजय बासल
१ दिसंबर २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter