अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        शीत ने पारा जमाया

 
माघ लेकर धुंध आया साथ अपने
शीत ने पारा जमाया

दुबक बैठा
कोटरों में त्रस्त खगकुल पंख मोड़े
पसर कुहरा हर दिशा में रश्मियों का दंभ तोड़े
शीत ने प्रस्ताव पारित कर गलन के
धूप को हाँका लगाया

साग बथुआ
गुड़ गजक का स्वाद मुँह में लगा घुलने
टोपियों, मफलर रजाई के लगे सन्दूक खुलने
नेह ने फंदे कसे उनसे लिपटकर
देह ने फिर ताप पाया

भा रहे कुछ को
मगर कुछ के लिये यह दिन कड़े हैं,
हैं इकाई एक लेकिन वस्तुतः यह दो धड़े हैं
एक मौसम ने धरा के मंच पर क्यों
दो तरह का राग गाया

- अनामिका सिंह
१ दिसंबर २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter