अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         धूप माघ में

 
थर-थर थर-थर काँप रही है
धूप माघ में हाँफ रही है

ठिठुर रही वह जाड़े में, ताप माँगती भाड़े में
पूछें थोड़ा रहती क्यों- लेती सबको आड़े में
साँझ हुई तन ढाँप रही है
धूप माघ में हाँप रही है

मनमौजी वह जाड़े में रखती सबको बाड़े में
मंथर गति से आती है- रखती सबको हाड़े में
अपना घर भी झाँप रही है
धूप माघ में हाँप रही है

सर्दी में लगती प्यारी सबको लगती है न्यारी
राह देखते सब इसकी- बन जाती यह सुकुमारी
सबके मन को भाँप रही है
धूप माघ में हाँफ रही है

- कामिनी श्रीवास्तव 'कीर्ति'
१ दिसंबर २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter