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हरिशंकर मिश्र सौभद्र की मुकरियाँ

 

१
मिटी तपिश वह जब से आया
अंग - अंग मेरा मुस्काया
भीगी चोली भीगा दामन
के सखि साजन?न सखि सावन
२
सारे जग में पिटा ढिंढोरा
नट-खट पागल श्यामल छोरा
उसकी प्रीति लगी मनभावन
के सखि साजन?न सखि सावन
३
उसने आकर जल बरसाया
विरहन मन का ताप बढ़ाया
नित जलती मैं बिना जलावन
के सखि साजन?न सखि सावन
४
वह अम्बर का सीना फाड़े
ऐसे रह - रह खूब दहाड़े
कभी बजावे लेकर मादल
के सखि साजन?न सखि बादल
५
सारा जग उससे अब ऊबा
घर आँगन सबका है डूबा
गर्जन सुनकर काँपे हाड़
के सखि साजन?न सखि बाढ़

- हरि शंकर मिश्र "सौभद्र"
१ अगस्त २०२६

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