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जिज्ञासा सिंह की मुकरियाँ

 

१
आधा गोरा आधा काला
रूप बदलता गड़बड़झाला
मुझे देख मुस्काता मंद
क्या सखि साजन? ना सखि चंद
२
सुन्दर मुंदर गोल मटोल
आया चार दिशाएँ डोल
उसे देख जाती मैं हँसि
क्या सखि साजन? ना सखि शशि
३
जग सोता वो तब है आता
देख भोर एकदम छुप जाता
रातों का शैतान परिंदा
क्या सखि साजन? ना सखि चंदा
४
बड़ी अनोखी उसकी सज्जा
देख मुझे पर आए लज्जा
रात्रि समय करता आदाब
क्या सखि साजन? ना महताब
५
दिखे सदा छत पर नादान
घूमे खेत और खलिहान
भर लूँ उसको अपने अंक
क्या सखि साजन? नहीं मयंक
६
मन के भीतर है रहता वो
अक्सर सबको है दिखता जो
जब दिल चाहे बदले भेष
क्या सखि साजन? ना राकेश
६
दिखा शकल फिर गायब वो
ऐसे रोज चिढ़ाता है जो
भौहों बीच सजा वो बिंदु
क्या सखि साजन? ना सखि इंदु

- जिज्ञासा सिंह
१ अगस्त २०२६

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