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कविता काव्या सखी की मुकरियाँ

 

१
उषा पूर्व ही वह जग जाता
वह ही मुझको नित्य जगाता
अति मुस्तैद लगे ज्यों गुरगा
ऐ सखि साजन? नहिं सखि मुर्गा

२
सखी रात को वह बतियाता
उसका रूप मुझे है भाता
सुबह तोड़ जाए पर फंदा
ऐ सखि साजन? नहिं सखि चंदा

३
कभी शांत वह कभी गरजता
हिय में जाने क्या-क्या रखता
देता खुशियाँ निकट बुलाकर
ऐ सखि साजन? नहिं सखि सागर

४
उसे लिये जब मैं हूँ सोती
मीठे सपनों में मैं खोती
बीते उस सँग मेरी रतिया
ऐ सखि साजन? नहिं सखि तकिया

५
दिन में उसका साथ अधूरा
साथ रात में देता पूरा
सुख देता उसका नित संग
ऐ सखि साजन? नहीं पलंग

६
सखि वह मेरा है आभूषण
उसके प्रति मन में आकर्षण
करे प्रथुल चोटी सँग खेला
ऐ सखि साजन? नहिं सखि बेला

७
तन-मन को वह तर कर देता
सँग उसका चुस्ती भर देता
लगी मुझे तो उसकी आदत
ऐ सखि साजन? नहिं सखि शर्बत

८
रूप सुहावन मन अनुकूल
देख उसे सब जाती भूल
लगा दुखों में सखी हलंत
ऐ सखि साजन? नहीं बसंत

९
देकर वह आवाज बुलाता
कभी-कभी सुर में वह गाता
कभी टेर लगती ज्यों भाला
क्या साजन? ना सब्जी वाला

१०
उसे देख बाहें फैलाऊँ
उसके साये में सुख पाऊँ
हो जाता दिल मेरा गद्गद
ऐ सखि साजन? नहिं सखि बरगद

- कविता काव्या सखी
१ अगस्त २०२६

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