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      डॉ मंजु गुप्ता की मुकरियाँ

 

१
जिसकी सुंदर लिपि मनुहारी
जन जन को वह लगती प्यारी
जिसके माथे सोहे बिंदी
क्या सखि नारी, ना सखी हिंदी

२
नील गगन पर वह नित मटके
चमक दमक से दुनिया चमके
देख उसे हो मन आनंदा
क्या सखि साजन ?न सखि, चंदा

३
जब भी बाहर को मैं जाती
जब भी बाहर से मैं आती
चलता मेरे संग निपूता
क्या सखि साजन? ना सखी जूता

४
उसको देखूँ छाए लाली
खुशियों की लाए उजियाली
देख उसे खिलता मन नीरज
क्या सखि साजन? ना सखि, सूरज

५
पाँच तत्व में उसकी महिमा
जीवन भर है उसकी गरिमा
प्राणों को दे यह जीवन बल
हे सखि साजन, ना सखि जल

६
उसकी श्यामल छवि मन भाए
आशाओं के पंख लगाए
देख उसे मेना मन हर्षा
क्या सखि साजन? ना सखि वर्षा

७
रूप बावरा गोरी काया
चमके-दमके उसकी माया
आँख मिचौली करे कामिनी
क्या सखि साजन, नहीं दामिनी

डॉ. मंजु गुप्ता
१ अगस्त २०२६

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