अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

मुरारी स्वामी की मुकरियाँ

 

१
सपने बड़े-बड़े दिखलाए
बात बनाए और रिझाए
लगे सभी की नैया खेता
ए सखी! साजन, नहिं री! नेता

२
दुख-सुख सबके हरदम बाटे
बात लगे उसकी फर्राटे
न पुल छोड़े न ही रेता
ए सखी! साजन, नहिं री! नेता

३
ऊँचा बोले मुझको छेड़े
नित गलियों के काटे गेड़े
देख मुझे सहलाये दाढ़ी
क्या सखि साजन? नहिं सखि कबाड़ी
 
४
देख मेघ को वो चिल्लाये
हर्षित होकर नाचे गाये
छलिया प्यारा वो चित्तचोर
क्या सखि साजन? नहिं सखि मोर

५
साथ उसी का हरदम भाता
देख उसी को मन है गाता
शीतलता का वो भान अमर
क्या सखि साजन? नहिं सखि कूलर

६
प्यारा मेरा राज दुलारा
अखिल विश्व में सबसे न्यारा
देख उसे मन होता चंगा
क्या सखि साजन? न सखि तिरंगा

- मुरारी स्वामी
१ अगस्त २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter