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निरुपमा सिंह ढाका की मुकरियाँ

 

१
कागज़ पर भाव उकेरे
मन के सारे भेद ये खोले
बिन बोले कथा सुनाए
ऐ सखि दर्पण?
ना सखि कलम

२
न रंग उसका न आकार कोई
फिर भी करता जीवन साकार वोही
साँस-साँस में रहता बस कर
ऐ सखि सुगंध?
ना सखि प्रेम

३
बरसे तो धरती मुस्काए
रुक जाए तो मन अकुलाए
जीवन का आधार वही है
ऐ सखि अमृत?
ना सखि मेघ

४
सबके घर में रोज़ ही जाए
फिर भी कोई रोक न पाए
आते-जाते उम्र चुरा ले
ऐ सखि चोर?
ना सखि समय

५
रात अंँधेरी संग में आया
चुपके-चुपके दीप जलाया
भोर भई तो कहीं न पाया
क्या सखि चाँद?
ना सखि सपना

- निरुपमा सिंह ढाका
१ अगस्त २०२६

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