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राजपाल सिंह गुलिया की मुकरियाँ

 

१.
दबे पाँव ये साँझ सकारे
आकर घर में डेरा डारे
मिले कहीं न ये सुबह सवेर
क्या सखि साजन ? नहीं अँधेर
२.
हटती नज़र न कभी हटाए
भेद स्वयं के खुद बतलाए
इसी से मिलता मुझे खिताब
क्या सखि साजन? ना सखि किताब
३.
कभी हराए कभी जिताए
लोभ दिखा कर पास बुलाए
लगे साख पर इससे बट्टा
क्या सखि साजन ? ना सखि सट्टा
४.
इनका माल अगर जो खाए
नाहक अपनी खाल खिंचाए
लगे मुझे ये यम का भाई
क्या सखि साजन ? न सखि कसाई
५.
तन का काला मन का काला
बनकर रहता भोला भाला
मुझको तो लगता है हौआ
क्या सखि साजन ? ना सखि कौआ
६.
नहीं धूप में साथ छोड़ता
घर घुसो तो मुख ये मोड़ता
इसका संग सदा मन भाया
क्या सखि साजन ? ना सखि साया
७.
उसका आना मन हर्षाए
सदा रहूँ मैं आँख बिछाए
मुझे भिगो हँसता है पागल
क्या सखि साजन ? ना सखि बादल
८.
वीरों में वह वीर बड़ा है
अपना सीना तान खड़ा है
लगता है फिर भी मनमौजी
क्या सखि साजन ? ना सखि फौजी
९.
रूप कौन सा धर कर आए
बातों से मुझको भरमाए
जाने क्यों ये लगे अनोखा
क्या सखि साजन ? ना सखि धोखा
१०.
किले हवाई रोज बनाए
चाँद सितारों से बहलाए
सच कहते ही पल में रूठा
क्या सखि साजन ? न सखि झूठा

- राजपाल सिंह गुलिया
१ अगस्त २०२६

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