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संजय सुजय बासल की मुकरियाँ

 

१.
अँखियन में वह रोज समाए?
मन के कोरे पृष्ठ सजाए
धड़के हिय? छूते ही काज—
कह सखी? साजन? नहीं? लाज

२.
धीरे-धीरे पास वह आए?
मीठे-मीठे बोल सुनाए
महके तन-मन? जागे साज—
कह सखी साजन? नहीं? आवाज
३.
अधरों पर मुस्कान बिखेरे?
नैनों से वह तीर उछेरे
जीत लिया उसने सब राज—
कह सखी? साजन? नहीं? नाज़
४.
चूड़ी खनके? पायल बोले?
साँस-साँस में सपने डोले
भीग गया मन आज ही आज—
कह सखी? साजन? नहीं? रिवाज़
५.
चाँद उतर आया अँगनाई?
रजनी ने चुनरी लहराई
प्रीत रची मन में नव साज—
कह सखी? साजन? नहीं? चाँद

- संजय सुजय बासल
१ अगस्त २०२६

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