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सरस दरबारी की मुकरियाँ

 

१
द्वार बजा उठ सांकर खोली
बैरी ने घुस सेज उकेली
खिंचता चीर हाथ से रोका
थे सखि साजन? ना वत झोंका

२
चढ़कर छत पर इकटक ताके
नहीं हाँकने से वह भागे
मन बहलाता, गाना गा-गा
क्या सखि प्रेमी? न सखि कागा

३
रात न आती वह आ जाता
आँगन में उजियारा लाता
जग कर रात निकाले बंदा
क्या सखि साजन? न सखि चन्दा
४
घर भर की रखवाली करता
रात साथ में मेरे सोता
दिन में दूर रहे अलबत्ता
क्या सखि साजन? न सखि कुत्ता
५
उस छत से आई इस छत पर
दीवारों को लाँघ फाँद कर
उसका सुंदर कंचन रूप
कौन पड़ोसन? नहीं रे धूप

- लक्ष्मीनारायण गुप्त
१ अगस्त २०२६

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