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जय कन्हैयालाल की
     

 





 

 


 




 


लिख रही हैं यातनायें
अनुभवों से
लघुकथाएँ -
मौसम-घड़ी-दिक्काल की !
जय-जय कन्हैया लाल की !!

शासकों के चोंचले हैं
लोग गोवर्द्धन उठायें
हम लुकाठी
ले खड़े हैं
चोंच में आकाश पाएँ
शातिर सदा पद
इन्द्र का
जो सोचता बस चाल की..

अब उफनती
है न जमुना
कालिया मथता अड़ा है
चेतना लुंठित-बलत्कृत
देह-मन
लथपथ पड़ा है
कुब्जा पड़ी हर घाट पर
किसको पड़ी है
ताल की !

नत कमर ले
शांत रहना
पीढ़ियों का सच यही है
कंस फिर पंचायतों में
भाग्य का षडयंत्र भी है.
फिर से जरासंधी-मिलन,
चर्चा हुई है जाल की

क्या गजब हो इस घड़ी जो
साध ले जग
वो हृदय हो
किन्तु यह भी है असंभव
घात-प्रतिघाती सदय हो
जब पूतना की गोद है,
फिर क्या कहें ग्रहचाल की !

-सौरभ पाण्डेय
१८ अगस्त २०१४

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