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सदियों से ढूँढूँ
     

 





 

 


 




 


तम में छिपते श्याम
घटा से
कभी छिपते सित भोर
सदियों से ढूँढूँ मैं
कान्हा
पाऊँ ओर न छोर

घोर तिमिर की छाया
में तुम
क्षण दर्पण देते हो
धुंध कुहासा हट
ना पाये
पल अर्पण लेते हो
तुम अदृश्य अनंत
अविनाशी
बँधे भी कैसे डोर

गोपियों के प्रेम में बसकर
भक्ति में हँसते हो
योगिराज युग युग
से, तंदुल
मित्र कभी रमते हो
ज्ञान भक्ति पथ हो
कोई भी
कर्म बिना नहीं ठौर।

सीमा हरि शर्मा
१८ अगस्त २०१४

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