अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

तुम नेह भरी बदली
     

 





 

 


 




 


तुम नेह भरी बदरी बनकर बरसो मेरे मन उपवन में।
मन एकाकी जलता जंगल, ज्यों जेठ छुपा हो सावन में।

फिर श्याम घटा छाई नभ में, इक हूक सी उट्ठी तनमन में।
कब कान सुनेंगे बोल तेरे, कब बंसी बजेगी मधुवन में।

बृज भू ही नहीं भारत ही नहीं, धरती ही नहीं यह सृष्टि सकल,
गुंजित है बंसी से तेरी, सुन पाऊँ मैं इस जीवन में।

इक बार झलक देखी तेरी, चिर प्यास जगी प्रिय दर्शन की,
क्यों नीर भरी गगरी धर दी, मेरे प्यासे दो नैनन में।

चलते-थमते, गिरते-उठते आ पहुँचा तेरे द्वार 'नया',
आ बाँह पकड़ सीने से लगा, धड़कन पैदा कर पाहन में।

- वी.सी. राय 'नया
१८ अगस्त २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter