अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

शुभ-कामनाएँ
 
फिर उमीदें, आस, चाहत,
और सपने गाँठ बाँधे,
खिलखिलाता आ गया दिन
बाँटने शुभ-कामनाएँ !

रात भर अवसाद भीगे
क्षण उनींदें कसमसाते
हिमकणों-से चुभ रहे थे
किंतु किससे बोल पाते
स्वर न हो अब कुंद
लेकर धूप में संवेदनाएँ
खिलखिलाता आ गया दिन
बाँटने शुभ-कामनाएँ !

देह पर लटका हुआ
कुर्ता उघड़ने से बचाना
एक धागे से दिखे लटका बटन
पर मत गिराना
देह-कुर्ते की तरह
हम हों, हमारी मान्यताएँ
खिलखिलाता आ गया दिन
बाँटने शुभ-कामनाएँ !

मानकों में नव्यता,
नव-दृष्टि को व्यापक समर्थन
इस तरह उपलब्धियों को
मिल सके आयाम नूतन
ताकि हों अभिव्यक्तियाँ सक्षम,
सुलभ हों व्यंजनाएँ
खिलखिलाता आ गया दिन
बाँटने शुभ-कामनाएँ !

- सौरभ पांडेय    
१ जनवरी २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter