अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

          नया सबेरा आया है

 
दूर रहें कह दो उन काली रातों से
उम्मीदों का सूरज फिर मुसकाया है
अनजाने सपनों की आकुल रात गयी
नयी किरण ले नया सबेरा आया है

मदमाते फूलों की हम क्या बात करें
हमने दामन में काँटे भी पालें है
बंद किए पलकों में यादों के पल छिन
कंपित अधरों पर मौसम के ताले हैं
आओ स्वागत करें हर्षमय जीवन का
जिसने अंधियारों में दीप जलाया है
नयी किरण ले नया सबेरा आया है

बंद झरोखों के अंधे कपाट खोलें
सन्नाटो में घोलें सरगम की बातें
मन के सूने आँगन में गुंजन भर दें
दीपों से जगमग हों अंधियारी रातें
मन-दर्पण में स्वप्न नया सरसाया है
नयी किरण ले नया सबेरा आया है

- पद्मा मिश्रा
१ जनवरी २०२२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter