अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         बीता पिछला वर्ष

 
भला-बुरा जैसा भी बीता
बीता पिछला वर्ष
आने वाला लेकर आये
नित नूतन उत्कर्ष
यही कामना, यही प्रार्थना
एक यही उद्गार
जाति-धर्म-भाषा को लेकर
अब न छिड़े संघर्ष

बौनों की लम्बी छाया से
छिके न स्वर्णिम धूप
खरबूजे सा रंग देखकर
लोग न बदलें रूप
विषम परिस्थिति में भी अपना
खोये नहीं विवेक
पर दुख देख दुखी हो मन,
देख हर्ष, हो हर्ष

बस्ती में कानून जंगली
करे नहीं उत्पात
सुनी-अनसुनी रह न जाये
हीरामन की बात
छीन निवाला किसी के मुख का
भरे न कोई पेट
अपनी अपनी जेबों में हों
अपने अपने पर्स

- शैलेन्द्र शर्मा
१ जनवरी २०२२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter