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        शुभकामनाओं का मंगल गान

 
कोहरे के आगोश से निकलकर
सूरज की नूतन किरणों ने
कड़कड़ाती ठंड से
कंपकपाते चेहरों पर
तपिश की खुशी भर दी

धूप का टुकड़ा
नव वर्ष का संदेश ले
मुंड़ेरों से उतर कर
छत और आँगन में
छा गया

नवल रश्मियों का अभिनंदन
करती धरा
फैला रही हरीतिमा की चादर
बिख़ेर मोतियों का सागर

नव वर्ष की बेला
कलिकाओं ने पट खोला
भ्रमरों ने किया
शुभकामनाओं का
मंगल गान

- बृजेश कुमार शुक्ला
१ जनवरी २०२५

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